शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

पर्यटन



पर्यटन
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध
 ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425484452


देख के कोई चित्र अलबम सुन के या करके पठन
जानते जब है कहीं कोई किला या ऐतिहासिक भवन
उनकी दर्शन लालसा तब पालता हर एक जन
बस इसी परिकल्पना की पूर्ति हित है पर्यटन

नदी निर्मल नीर निर्झर पडे पौधे वन सघन
देख अनुपम प्रकृति शोेभा मुदित हो जाता है मन
भूल सब दुखदर्द जग के शांति पाते है नयन
इन्ही मन की चाह पूरी करने होता पर्यटन

मिलती है खुशियाॅ तो संग ही बढता है ज्ञान धन
मिलती नई नई जानकारी बहुतो से होता मिलन
यात्रा के होते अनुभव बुद्धि पाती उन्नयन
है अनेको ज्ञान गुण का लाभदाता पर्यटन

सभी के मन को है भाता यभा संभव परिभ्रमण
बढाना संपर्क कई से करना नव ज्ञानार्जन
हर जगह उपलब्ध है अब सुविधाये भोजन शयन
साथ ही आवागम की सुखद इससे पर्यटन

तीर्थ दर्शन देव दर्शन प्राकृतिक पर्यावरण
निरख कर मन सोचता करता कभी चिंतन मनन
कौन है वह शक्ति जिसमे किया इन सबका सृजन
प्रकृति पूजा आत्मचिंतन भाव देता पर्यटन

समस्या का हल नहीं है युद्ध, है सद्भाव



समस्या का हल नहीं है युद्ध है सद्भाव

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध
 ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425484452


सही सोच विचार से मिलती प्रगति की राह
सबको होनी चाहिये उसकी उचित परवाह

बैर भाव नहीं कभी  भी मनुज की पहचान
फिर भला सब कुछ मिटाने क्यो लडे इंसान?

सभी धर्मो ने सिखा दी प्रेम की ही बात
बैर से होती हमेशा दुखो की बरसात

उजाला खुशियों का मिट छा जाता है अंधियार
मारकाट औं युद्धो में है दुखो की भरमार

दुश्मनी कर जी नही सकता कभी इंसान
जो झगडता रहता उसको कहते सब नादान

युद्ध में होते हमेशा ही गलत व्यवहार
युद्ध तो है दुख का कारण जीत हो या हार

रोकनी पडती लडाई हो सदा लाचार
इससे अच्छा जीतना मन करके सच्चा प्यार

समस्यायें सुलझती जब होती मिलकर बात
सफलता को चाहिये सद्भाव सबका साथ।

युद्ध तो अब समझा जाता एक मानसिक रोग
हर समस्या सुलझती यदि सबका हो सहयोग

लडाई दे जाती सबके मन को गहरे घाव
समस्या का हल नहीं है युद्ध है सद्भाव

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NO WAR PLEASE



सिर्फ मन की ईष्र्या को त्यागना है।

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध
 ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425484452

नाम तो है पाकपर नापाक हरकत
कैसी मन की अटपटी सी भावना है?

बेवजह घुस पडोसी की सरहदों में
मारना निर्दोषो को क्या कामना है?

युद्धो ने तो उजाडे कई देश पहले
आये दिन फिर युद्ध नये क्यो ठानना है?

बचाई जा सकती कई निर्दोष जानें
सिर्फ मन की ईष्र्या को त्यागना है।

जरूरी है समझदारी हर कदम पर
आदमियत के रिश्तों को यदि पालना है।

राख कर देगी तुम्हीं को आग जल यह
सोचो समझो खुद को अगर उबारना है

हम तो समझते रहे हर बार तुमको
तुम्हें अपने आपको पहचानना है।

मिल के रहने में भलाई है सभी की
दुनियाॅ की यह बात दिल से मानना है।

लडाई दे जाती सबको घाव गहरे
इससे बचने मन को बहुत सम्हालना है।


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शनिवार, 8 अगस्त 2015

एक चित्र की चित्रकार से प्रार्थना

एक चित्र की चित्रकार से प्रार्थना

प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव ‘‘विदग्ध‘‘
ओबी 11 एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर 482008
मो. न. 9425806252

तुम्हारे ही हाथो बनाया गया, तुम्ही से मगर अब भुलाया गया हॅू।
कई साल पहले बना रूप रेखा, मुझे सौ निगाहों से तुमने था देखा।
कभी कुछ हॅंसे थे कभी मुस्कुराये कभी भौं सिकोडी कभी मुॅह था फेरा
मगर फिर मधुर गुनगुनाते हुये चित्र जिसमें कि तुम थे लगे रंग भरने
वही हॅू उपेक्षित सा बिसरा हुआ सा, चपेटो के बीचों दबाया गया हॅू।

सजग कल्पना के चटक रंग कई मिल लगे थे मेरा यह कलेवर सजाने
या जिन जिनने देखा सभी ने कहा था मुझे अपने गृह का सुषोभक बनाने
तुम्हें भी खुषी थी, मगर तूलिका से टपक एक कणिका गई अश्रुकण बन
तभी से मेरा हास्य रोदन बना पर मेै रोया नही हॅू रूलाया गया हॅू।

बनने के पहले ही बिगडा नया और होने के पहले पुराना हुआ जो
उठा शुष्क को आर्द्र कर अश्रुजल से कि जिस तूूलिका ने सजाया है मुझको
उसी की कृपाकर लगाचार कूचे ये आंसू मिटा दो औं मुस्कान भर दो
तुम्हारे ही हाथो है निर्माण मेरा तुम्ही से अधूरा बनाया गया हॅू।

प्रकृति के पटल पर समय धूल से क्यो परिवृत होते दिया त्याग तुमने
हुये रंग फीके मेरे किंतु तब से हुये नित नये किंतु निर्माण कितने
मैं आषा लिये ही पडा सह चुका सब प्रखर ग्रीष्म वर्षा के झोके जकोरे
बनाया है मुझको तो पूरा बना दो मिटाओ न क्योंकि भुलाया गया हॅू।
तुम्हारे ही हाथों है निर्माण मेरा, न जाने कि क्यों यो भुलाया गया हॅू।


 

संतुलन चाहिये

संतुलन चाहिये

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव
                                 ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
                                      रामपुर, जबलपुर
                                      मो.9425806252

जग में खुद की आंै सब की खुषी के लिये
स्वार्थ परमार्थ में संतुलन चाहिये

आये बढते निरंतर मनुज के चरण
किंतु अपने से ऊपर न उठ पाया मन।
सारी दुनियाॅ इसी से परेषान है
कई के आॅसुओ से भरे हैं नयन
सारी दुनियाॅ मंे दुख के शमन के लिये
लोगों में सबके मन का मिलन चाहिये।

आज आॅंगन धरा का गया बन गगन
नई आषाओ से चेहरे दिखते मगन
भूल छोटी भी कोई किसी भी तरफ
डर है कर सकती जग की खुषी का हरण
एक आॅंगन में सम्मिलित जषन के लिये
भावनाओं का एकीकरण चाहिये।

मन की बातों का अक्सर न होता कथन
ये है इस सभ्य दुनियाॅ का प्रचलित चलन
हाथ तो मिलाये जाते है मिलने पै पर
यह बताना कठिन कितने मिल पाये मन
विश्व में मुक्त वातावरण सृजन के लिये
पारदर्षी खुला आचरण चाहिये।