Wednesday, March 5, 2008
तब और अब
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ईशाराधन , वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा , मुक्तक संग्रह, अनुवादित पुस्तकें मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद , रघुवंशम् पद्यानुवाद, प्रतिभा साधन . शैक्षिक किताबें समाजोपयोगी उत्पादक कार्य , शिक्षण में नवाचार . संकलन उद्गम , सदाबहार गुलाब , गर्जना , युगध्वनि ,जय जवान जय किसान संपादन अर्चना, पयस्वनी ,उन्मेष , वातास पत्रिकायें
सामाजिक लेखन हेतु ११ वें रेड एण्ड व्हाईट पुरस्कार से सम्मानित . "रामभरोसे", "कौआ कान ले गया" व्यंग संग्रहों ," आक्रोश" काव्य संग्रह ,"हिंदोस्तां हमारा " , "जादू शिक्षा का " नाटकों के माध्यम से अपने भीतर के रचनाकार की विवश अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का दुस्साहस ..हम तो बोलेंगे ही कोई सुने न सुने . यह लेखन वैचारिक अंतर्द्वंद है ,मेरे जैसे लेखकों का जो अपना श्रम, समय व धन लगाकर भी सच को "सच" कहने का साहस तो कर रहे हैं ..इस युग में . लेखकीय शोषण , व पाठकहीनता की स्थितियां हम सबसे छिपी नहीं है , पर समय रचनाकारो के इस सारस्वत यज्ञ की आहुतियों का मूल्यांकन करेगा इसी आशा और विश्वास के साथ ..