दिल्ली में राष्ट्रमंडलीय क्रीडोत्सव के उदघाटन अवसर पर दिनांक 03.10.2010 को नेहरू स्टेडियम में गाकर प्रस्तुत किये जाने हेतु सार्थक ‘थीम-गीत‘
राष्ट्र मंडल देश के प्रतिभागियो ! तव स्वागतम्,
आपके इस आगमन पर, सब नमन करते हैं हम।
दिखायें निज खेल और कलाओं की चतुराईयां
मधुर मेल मिलाप से पट जायें मन की खाईयां।
परस्पर कर प्रदर्षन, ऊंचाईयां सब पा सके,
नयन में सपने सजाये, गीत हम मिल गा सके।
हो सके सबके लिये कल्याणकारी यह घडी,
खेलो की लडियों में जुडकर हो सफल यह शुभ कड़ी।
हर्ष के जयकार से गूंजे सघन भारत गगन,
विश्व व्यापी भेद भावों का यहां होवे शमन।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252
प्रकाशित किताबें ...ईशाराधन ,वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान,जनसेवा, अंधा और लंगड़ा ,मुक्तक संग्रह,मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद ,रघुवंशम् पद्यानुवाद,समाजोपयोगी उत्पादक कार्य ,शिक्षण में नवाचार
बुधवार, 8 सितंबर 2010
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
देश दिखता मुझे बहुत बीमार है...........
देश दिखता मुझे बहुत बीमार है...........
(प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘ ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र. )
है बुरा हाल मंहगाई की मार है, देश दिखता मुझे बहुत बीमार है।
गांव की हर गली झोपडी है दुखी, भूख से बाल-बच्चों में चीत्कार है।
शांति उठ सी गई आज धरती से है, लोग सारे ही व्याकुल है बेचैन हैं
पेट की आग को बुझाने की फिकर में, सभी जन सतत व्यस्त दिन रैन है।
जो जहाँ भी है उलझन में गंभीर है, आयें दिन बढती जाती नई पीर है।
रोजी रोटी के चक्कर में है सब फंसे, साथ देती नहीं किंतु तकदीर है।
प्रदर्शन है कहीं, कहीं हड़ताल है, कहीं करफ्यू कहीं बंद बाजार है।
लाठियाँ, गोलियाँ औ‘ गिरफ्तारियाँ, जो जहाँ भी है भड़भड़ से बेजार है।
समझ आता नहीं, क्यों ये क्या हो रहा, लोग आजाद हैं डर किसी को नहीं।
मानता नहीं कोई किसी का कहा, जिसे जो मन में आता है करता वहीं।
बातों में सब हुये बड़े होषियार है, सिर्फ लेने को हर लाभ आगे खड़े।
किंतु सहयोग और समझारी भुला, स्वार्थ हित सिर्फ लड़ने को रहते अड़े है।
आदमी खो चुका आदमियत इस तरह, कहीं कोई न दिखता समझदार है,
जैसे रिष्ता किसी का किसी से नहीं, जिसे देखो वो लड़ने को तैयार है।
समझते लोग कम है नियम कायदे, देखते सभी अपने ही बस फायदे,
राजनेताओं को याद रहते नहीं, कभी जनता से जो भी किये वायदे।
चाह उनकी हैं पहले सॅंवर जाये घर, देशहित की किसी को नहीं कोई फिकर,
बढ़ रही है समस्यायें नित नई मगर, रीति और नीति में कोई न दिखता असर।
घूंस लेना औ‘ देना चलन बन गई, सीधा- सच्चा जहाँ जो हैं लाचार है।
रोज घपले घोटाले है सरकार में, किंतु होता नहीं कोई उपचार है।
योजनायें नई बनती है आयें दिन, किंतु निर्विघ्न होने न पातीं सफल।
बढ़ता जाता अंधेरा हर एक क्षेत्र में, डर है शायद न हो घना और ज्यादा कल।
सिर्फ आशा है भगवान से, उठ चुका आपसी प्रेम सद्भाव विष्वास है।
देष की दुर्दशा देख होता है दुख, जिसका उज्जवल रहा पिछला इतिहास है।
आज की रीति हुई काम जिससे बने, कहा जाता उसी को सदाचार है।
जो निरूपयोगी उसका तिरस्कार है, आज का ‘विदग्ध‘ यह ही सुसंस्कार है।
कल क्या होगा यह कहना बहुत ही कठिन है, कोई भी नहीं दिखता खबरदार है
जिसे देखों जहाँ देखों, वह ही वहाँ कम या ज्यादा बराबर गुनहगार है।
(प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘ ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र. )
है बुरा हाल मंहगाई की मार है, देश दिखता मुझे बहुत बीमार है।
गांव की हर गली झोपडी है दुखी, भूख से बाल-बच्चों में चीत्कार है।
शांति उठ सी गई आज धरती से है, लोग सारे ही व्याकुल है बेचैन हैं
पेट की आग को बुझाने की फिकर में, सभी जन सतत व्यस्त दिन रैन है।
जो जहाँ भी है उलझन में गंभीर है, आयें दिन बढती जाती नई पीर है।
रोजी रोटी के चक्कर में है सब फंसे, साथ देती नहीं किंतु तकदीर है।
प्रदर्शन है कहीं, कहीं हड़ताल है, कहीं करफ्यू कहीं बंद बाजार है।
लाठियाँ, गोलियाँ औ‘ गिरफ्तारियाँ, जो जहाँ भी है भड़भड़ से बेजार है।
समझ आता नहीं, क्यों ये क्या हो रहा, लोग आजाद हैं डर किसी को नहीं।
मानता नहीं कोई किसी का कहा, जिसे जो मन में आता है करता वहीं।
बातों में सब हुये बड़े होषियार है, सिर्फ लेने को हर लाभ आगे खड़े।
किंतु सहयोग और समझारी भुला, स्वार्थ हित सिर्फ लड़ने को रहते अड़े है।
आदमी खो चुका आदमियत इस तरह, कहीं कोई न दिखता समझदार है,
जैसे रिष्ता किसी का किसी से नहीं, जिसे देखो वो लड़ने को तैयार है।
समझते लोग कम है नियम कायदे, देखते सभी अपने ही बस फायदे,
राजनेताओं को याद रहते नहीं, कभी जनता से जो भी किये वायदे।
चाह उनकी हैं पहले सॅंवर जाये घर, देशहित की किसी को नहीं कोई फिकर,
बढ़ रही है समस्यायें नित नई मगर, रीति और नीति में कोई न दिखता असर।
घूंस लेना औ‘ देना चलन बन गई, सीधा- सच्चा जहाँ जो हैं लाचार है।
रोज घपले घोटाले है सरकार में, किंतु होता नहीं कोई उपचार है।
योजनायें नई बनती है आयें दिन, किंतु निर्विघ्न होने न पातीं सफल।
बढ़ता जाता अंधेरा हर एक क्षेत्र में, डर है शायद न हो घना और ज्यादा कल।
सिर्फ आशा है भगवान से, उठ चुका आपसी प्रेम सद्भाव विष्वास है।
देष की दुर्दशा देख होता है दुख, जिसका उज्जवल रहा पिछला इतिहास है।
आज की रीति हुई काम जिससे बने, कहा जाता उसी को सदाचार है।
जो निरूपयोगी उसका तिरस्कार है, आज का ‘विदग्ध‘ यह ही सुसंस्कार है।
कल क्या होगा यह कहना बहुत ही कठिन है, कोई भी नहीं दिखता खबरदार है
जिसे देखों जहाँ देखों, वह ही वहाँ कम या ज्यादा बराबर गुनहगार है।
रविवार, 9 मई 2010
भूटान में हुये भारत पाक संवाद के परिप्रेक्ष्य में
भूटान में हुये भारत पाक संवाद के परिप्रेक्ष्य में
प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध "
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२
आये दिन काश्मीर में बारूद का उठता धँआ
मेल मिल्लत का हरेक संदेश होता अनसुना
हम निभाते आये सारे आदमियत के वायदे
पर पड़ोसी उलझने का खोजता रहता खुआ
कैसे हो कोई सुलह की बात इन हालात में ?
केसरों की क्यारियों में हर कदम बिखरे हैं बम
दुश्मनी की भावना उनकी न हो पाई है कम
जब जहाँ नेता मिले , मिले हाथ , कुछ बातें हुईं
पर किये गये वायदों पर कब उठाये गये कदम ?
कैसे हो विश्वास हमको उनकी ऐसी बात में ?
हो रही मुठभेड़ अब भी वायदों के बाद भी
मस्जिदें दरगाहें अब तक हैं पड़ी बरबाद ही
सरहदों को तोड़ घुस आते नये घुसपैठिये
मन न मिल पायें तो झूठे हैं बड़े संवाद भी
बदलते कब किसी के भी मन कभी एक रात में ?
पिछले अनुभव सामने हैं लंबी लंबी बात के
घाव रिसते आज भी हैं किये गये आघात के
भेद भारी है वहाँ आवाम औ" सरकार में
दिख रहे आसार नई जनक्रांति के उत्पात के
दिखावा ज्यादा सचाई कम है हर अनुपात में
हाथ अब तक क्या लगा वर्षों के वाद विवाद में
समझ आते भाव मन के साफ हर संवाद में
जवानों ने जान देकर खून से सींचा वतन
स्नेह का विश्वास कैसे जगे अब जल्लाद में ?
क्या पता घटनायें क्या हों आ रही बरसात में ?
कवि सुप्रसिद्ध गीतकार ,अनुवादक , शिक्षाविद , अर्थशास्त्री व समाजसेवी हैं . वतन को नमन , अनुगुंजन , ईशाराधन , आदि कृतियां पुस्तकाकार प्रकाशित व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हैं
प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध "
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२
आये दिन काश्मीर में बारूद का उठता धँआ
मेल मिल्लत का हरेक संदेश होता अनसुना
हम निभाते आये सारे आदमियत के वायदे
पर पड़ोसी उलझने का खोजता रहता खुआ
कैसे हो कोई सुलह की बात इन हालात में ?
केसरों की क्यारियों में हर कदम बिखरे हैं बम
दुश्मनी की भावना उनकी न हो पाई है कम
जब जहाँ नेता मिले , मिले हाथ , कुछ बातें हुईं
पर किये गये वायदों पर कब उठाये गये कदम ?
कैसे हो विश्वास हमको उनकी ऐसी बात में ?
हो रही मुठभेड़ अब भी वायदों के बाद भी
मस्जिदें दरगाहें अब तक हैं पड़ी बरबाद ही
सरहदों को तोड़ घुस आते नये घुसपैठिये
मन न मिल पायें तो झूठे हैं बड़े संवाद भी
बदलते कब किसी के भी मन कभी एक रात में ?
पिछले अनुभव सामने हैं लंबी लंबी बात के
घाव रिसते आज भी हैं किये गये आघात के
भेद भारी है वहाँ आवाम औ" सरकार में
दिख रहे आसार नई जनक्रांति के उत्पात के
दिखावा ज्यादा सचाई कम है हर अनुपात में
हाथ अब तक क्या लगा वर्षों के वाद विवाद में
समझ आते भाव मन के साफ हर संवाद में
जवानों ने जान देकर खून से सींचा वतन
स्नेह का विश्वास कैसे जगे अब जल्लाद में ?
क्या पता घटनायें क्या हों आ रही बरसात में ?
कवि सुप्रसिद्ध गीतकार ,अनुवादक , शिक्षाविद , अर्थशास्त्री व समाजसेवी हैं . वतन को नमन , अनुगुंजन , ईशाराधन , आदि कृतियां पुस्तकाकार प्रकाशित व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हैं
गुरुवार, 6 मई 2010
माँ नर्मदा की मनोव्यथा
माँ नर्मदा की मनोव्यथा
प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध "
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
जो मीठा पावन जल देकर हमें सुस्वस्थ बनाती है
जिसकी घाटी औ" जलधारा सबके मन को भाती है
तीर्थ क्षेत्र जिसके तट पर हैं जिसकी होती है पूजा
वही नर्मदा माँ दुखिया सी अपनी व्यथा सुनाती है
पूजा तो करते सब मेरी पर उच्छिष्ट बहाते हैं
कचरा पोलीथीन फेंक जाते हैं जो भी आते हैं
मैल मलिनता भरते मुझमें जो भी रोज नहाते हैं
गंदे परनाले नगरों के मुझमें डाले जाते हैं
जरा निहारो पड़ी गन्दगी मेरे तट औ" घाटों में
सैर सपाटे वालों यात्री ! खुश न रहो बस चाटों में
मन के श्रद्धा भाव तुम्हारे प्रकट नहीं व्यवहारों में
समाचार सब छपते रहते आये दिन अखबारों में
ऐसे इस वसुधा को पावन मैं कैसे कर पाउँगी ?
पापनाशिनी शक्ति गवाँकर विष से खुद मर जाउंगी
मेरी जो छबि बसी हुई है जन मानस के भावों में
धूमिल वह होती जाती अब दूर दूर तक गांवों में
प्रिय भारत में जहाँ कहीं भी दिखते साधक सन्यासी
वे मुझमें डुबकी , तर्पण ,पूजन ,आरति के अभिलाषी
सब तुम मुझको माँ कहते , तो माँ सा बेटों प्यार करो
घृणित मलिनता से उबार तुम सब मेरे दुख दर्द हरो
सही धर्म का अर्थ समझ यदि सब हितकर व्यवहार करें
तो न किसी को कठिनाई हो , कहीं न जलचर जीव मरें
छुद्र स्वार्थ ना समझी से जब आपस में टकराते हैं
इस धरती पर तभी अचानक विकट बवण्डर आते हैं
प्रकृति आज है घायल , मानव की बढ़ती मनमानी से
लोग कर रहे अहित स्वतः का , अपनी ही नादानी से
ले निर्मल जल , निज क्षमता भर अगर न मैं बह पाउंगी
नगर गांव, कृषि वन , जन मन को क्या खुश रख पाउँगी ?
प्रकृति चक्र की समझ क्रियायें ,परिपोषक व्यवहार करो
बुरी आदतें बदलो अपनी , जननी का श्रंगार करो
बाँटो सबको प्यार , स्वच्छता रखो , प्रकृति उद्धार करो
जहाँ जहाँ भी विकृति बढ़ी है बढ़कर वहाँ सुधार करो
गंगा यमुना सब नदियों की मुझ सी राम कहानी है
इसीलिये हो रहा कठिन अब मिलना सबको पानी है
समझो जीवन की परिभाषा , छोड़ो मन की नादानी
सबके मन से हटे प्रदूषण , तो हों सुखी सभी प्राणी !!
प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध "
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
जो मीठा पावन जल देकर हमें सुस्वस्थ बनाती है
जिसकी घाटी औ" जलधारा सबके मन को भाती है
तीर्थ क्षेत्र जिसके तट पर हैं जिसकी होती है पूजा
वही नर्मदा माँ दुखिया सी अपनी व्यथा सुनाती है
पूजा तो करते सब मेरी पर उच्छिष्ट बहाते हैं
कचरा पोलीथीन फेंक जाते हैं जो भी आते हैं
मैल मलिनता भरते मुझमें जो भी रोज नहाते हैं
गंदे परनाले नगरों के मुझमें डाले जाते हैं
जरा निहारो पड़ी गन्दगी मेरे तट औ" घाटों में
सैर सपाटे वालों यात्री ! खुश न रहो बस चाटों में
मन के श्रद्धा भाव तुम्हारे प्रकट नहीं व्यवहारों में
समाचार सब छपते रहते आये दिन अखबारों में
ऐसे इस वसुधा को पावन मैं कैसे कर पाउँगी ?
पापनाशिनी शक्ति गवाँकर विष से खुद मर जाउंगी
मेरी जो छबि बसी हुई है जन मानस के भावों में
धूमिल वह होती जाती अब दूर दूर तक गांवों में
प्रिय भारत में जहाँ कहीं भी दिखते साधक सन्यासी
वे मुझमें डुबकी , तर्पण ,पूजन ,आरति के अभिलाषी
सब तुम मुझको माँ कहते , तो माँ सा बेटों प्यार करो
घृणित मलिनता से उबार तुम सब मेरे दुख दर्द हरो
सही धर्म का अर्थ समझ यदि सब हितकर व्यवहार करें
तो न किसी को कठिनाई हो , कहीं न जलचर जीव मरें
छुद्र स्वार्थ ना समझी से जब आपस में टकराते हैं
इस धरती पर तभी अचानक विकट बवण्डर आते हैं
प्रकृति आज है घायल , मानव की बढ़ती मनमानी से
लोग कर रहे अहित स्वतः का , अपनी ही नादानी से
ले निर्मल जल , निज क्षमता भर अगर न मैं बह पाउंगी
नगर गांव, कृषि वन , जन मन को क्या खुश रख पाउँगी ?
प्रकृति चक्र की समझ क्रियायें ,परिपोषक व्यवहार करो
बुरी आदतें बदलो अपनी , जननी का श्रंगार करो
बाँटो सबको प्यार , स्वच्छता रखो , प्रकृति उद्धार करो
जहाँ जहाँ भी विकृति बढ़ी है बढ़कर वहाँ सुधार करो
गंगा यमुना सब नदियों की मुझ सी राम कहानी है
इसीलिये हो रहा कठिन अब मिलना सबको पानी है
समझो जीवन की परिभाषा , छोड़ो मन की नादानी
सबके मन से हटे प्रदूषण , तो हों सुखी सभी प्राणी !!
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
व्यक्ति की विन्रमता , सदाचार , गुणवत्ता और कार्यकुशलता को महत्व व सम्मान देने का युग जाने क्यों समाप्त हो गया है .
व्यक्ति की विन्रमता , सदाचार , गुणवत्ता और कार्यकुशलता को महत्व व सम्मान देने का युग जाने क्यों समाप्त हो गया है .
हमारे समय का व्यक्ति की विन्रमता , सदाचार , गुणवत्ता और कार्यकुशलता को महत्व व सम्मान देने का युग जाने क्यों समाप्त हो गया है ? आज समाज में चापलूसी , झूठी प्रशंसा ,और अपना मतलब पूरा करने के लिये किसी भी सीमा तक गिरकर , काम निकालने में निपुण व्यक्ति ही योग्य माना जाता है . उसे टैक्ट फुल कहा जाता है .शासकीय नौकरियों में अनेको ऐसे लोग दिखते हैं जो नौकरी तो सरकारी कर रहे हैं , पर कथित रूप से टैक्टफुल बनकर वे व्यवसाय अपना ही कर रहे हैं , चिकित्सा , शिक्षा व अन्य क्षेत्रों से जुड़े अनेक व्यक्ति अपनी सरकारी नौकरी का अपने निहित हितो के लिये उपयोग करते सहज ही मिल जाते हैं . मन में भले ही हम ऐसे व्यक्तियो की वास्तविकता समझते हुये , पीठ पीछे उनकी निंदा करें , पर अपनी चाटुकारिता के चलते ऐसे लोग लगातार फलीभूत ही होते दिखते हैं , व समाज में सफल माने जाते हैं . इस प्रवृति से शासकीय सेवा के वास्तविक उद्शेश्य ही दिग्भ्रमित हो रहे हैं .
हमारे समय में कर्तव्य निष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ की चापलूसी की बू पाकर उसे झिड़क देते थे , कर्तव्यपरायण , गुणी व्यक्ति की मुक्त कंठ प्रशंसा करते थे , व अपने अधिकारो का उपयोग करते हुये ऐसे व्यक्ति को भरपूर सहयोग देते थे . जनहित के उद्देश्य को प्रमुखता दी जाती थी .
वर्तमान सामाजिक मानसिकता व स्वार्थसिक्त व्यवहारों को देख सुनकर मुझे अपने सेवाकाल के १९५० के दशक के मेरे अधिकारियों के कर्तव्य के प्रति संवेदनशील समर्पण के व्यवहार बरबस याद आते हें . तब सी पी एण्ड बरार राज्य था , वर्ष १९५० में , मैं अकोला में हिन्दी शिक्षक था . मुझे याद है उस वर्ष ग्रीष्मावकाश १ मई से १५ जून तक था . १६ जून से प्रौढ़ शिक्षा की कक्षायें लगनी थीं . जब १४जून तक मुझे मेरा पदांकन आदेश नहीं मिला तो मैं स्वयं ही अपने कर्तव्य के प्रति जागरूखता के चलते अकोला पहुंच गया व संभागीय शिक्षा अधिक्षक महोदय से सीधे उनके निवास पर सुबह ही मिला , मुझे स्मरण है कि, मुझे देकते ही उन्होंने मेरे आने का कारण पूछा , व यह जानकर कि मुझे पदांकन आदेश नही मिल पाया है , वे अपने साथ अपनी कार में ही मुझे कार्यालय ले गये , व संबंधित लिपिक को उसकी ढ़ीली कार्य शैली हेतु डांट लगाई , व मुझे तुरंत मेरा आदेश दिलवाया .मेरा व उन अधिकारि का केवल इतना संबंध था कि उन्होंने पिछले दो तीन वर्षो में ,मेरी कार्य कुशलता , क्षमता व व्यवहार देखा था और अपनी रिपोर्ट में मेरे लिये प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी थीं . मैं समझता हूं कि शायद आज के परिवेश में कोई अधिकारी यदि इस तरह आगे बढ़कर किसी अधीनस्थ कर्मचारी की मदद करे तो शायद उसकी निष्ठा व ईमानदारी पर ही लोग खुसुर पुसुर करने लगें . युग व्यवहार में यह परिवर्तन कब और किस तरह आ गया है समझ से परे है .
हमारी पीढ़ी ने लालटेन और ढ़िबरियो के उजाले को चमचमाती बिजली के प्रकाश में बदलते देखा है . पोस्टकार्ड और तार के इंतजार भरे संदेशों को मोबाइल के त्वरित संपर्को में बदलते हम जी रहे हैं . लम्बी इंतजार भरी थका देने वाली यात्राओ की जगह आरामदेह हवाई यात्राओ से दूरियां सिमट सी गई हैं , हम इसके भी गवाह हैं . मुझे याद है कि १९५० के ही दशक में जब राज्यपाल हमारे मण्डला आने वाले थे तो उनका छपा हुआ टूर प्रोग्राम महीने भर पहले हमारे पास आया था , शायद उसकी एक प्रिंटेड प्रति अब भी मेरे पास सुरक्षित है , अब तो शायद स्वयं राज्यपाल महोदय भी न जानते होंगे कि दो दिन बाद उन्हें कहां जाना पड़ सकता है . भौतिक सुख संसाधनो का विस्तार जितना हमारी पीढ़ी ने अनुभव किया है शायद ही हमसे पहले की किसी पीढ़ी ने किया हो . लड़कियों की शिक्षा के विस्तार से स्त्रियो के जीवन में जो सकारात्मक क्राति आई है वह स्वागतेय है , पर उनके पहनावे में जैसे पाश्चात्य परिवर्तन हम देख रहे हैं , हमसे पहले की पीढ़ी ने कभी नही देखे होंगे . पर इस सबके साथ यह भी उतना ही कटु सत्य है , जिसे मैं स्वीकार करना चाहता हूं और उस पर गहन क्षोभ व अफसोस व्यक्त करना चाहता हूं कि लोक व्यवहार में जितना सामाजिक नैतिक अधोपतन हमारी पीढ़ी ने देखा है , उतनी तेजी से यह गिरावट इससे पहले शायद ही कभी हुई हो .
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव " विदग्ध ", सेवानिवृत प्राध्यापक , प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय , जबलपुर
वरिष्ट कवि , अर्थशास्त्री , व कालिदास के ग्रंथो के हिन्दी पद्यानुवादक
संपर्क ओ बी ११ . विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर , मो ९४२५८०६२५२
हमारे समय का व्यक्ति की विन्रमता , सदाचार , गुणवत्ता और कार्यकुशलता को महत्व व सम्मान देने का युग जाने क्यों समाप्त हो गया है ? आज समाज में चापलूसी , झूठी प्रशंसा ,और अपना मतलब पूरा करने के लिये किसी भी सीमा तक गिरकर , काम निकालने में निपुण व्यक्ति ही योग्य माना जाता है . उसे टैक्ट फुल कहा जाता है .शासकीय नौकरियों में अनेको ऐसे लोग दिखते हैं जो नौकरी तो सरकारी कर रहे हैं , पर कथित रूप से टैक्टफुल बनकर वे व्यवसाय अपना ही कर रहे हैं , चिकित्सा , शिक्षा व अन्य क्षेत्रों से जुड़े अनेक व्यक्ति अपनी सरकारी नौकरी का अपने निहित हितो के लिये उपयोग करते सहज ही मिल जाते हैं . मन में भले ही हम ऐसे व्यक्तियो की वास्तविकता समझते हुये , पीठ पीछे उनकी निंदा करें , पर अपनी चाटुकारिता के चलते ऐसे लोग लगातार फलीभूत ही होते दिखते हैं , व समाज में सफल माने जाते हैं . इस प्रवृति से शासकीय सेवा के वास्तविक उद्शेश्य ही दिग्भ्रमित हो रहे हैं .
हमारे समय में कर्तव्य निष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ की चापलूसी की बू पाकर उसे झिड़क देते थे , कर्तव्यपरायण , गुणी व्यक्ति की मुक्त कंठ प्रशंसा करते थे , व अपने अधिकारो का उपयोग करते हुये ऐसे व्यक्ति को भरपूर सहयोग देते थे . जनहित के उद्देश्य को प्रमुखता दी जाती थी .
वर्तमान सामाजिक मानसिकता व स्वार्थसिक्त व्यवहारों को देख सुनकर मुझे अपने सेवाकाल के १९५० के दशक के मेरे अधिकारियों के कर्तव्य के प्रति संवेदनशील समर्पण के व्यवहार बरबस याद आते हें . तब सी पी एण्ड बरार राज्य था , वर्ष १९५० में , मैं अकोला में हिन्दी शिक्षक था . मुझे याद है उस वर्ष ग्रीष्मावकाश १ मई से १५ जून तक था . १६ जून से प्रौढ़ शिक्षा की कक्षायें लगनी थीं . जब १४जून तक मुझे मेरा पदांकन आदेश नहीं मिला तो मैं स्वयं ही अपने कर्तव्य के प्रति जागरूखता के चलते अकोला पहुंच गया व संभागीय शिक्षा अधिक्षक महोदय से सीधे उनके निवास पर सुबह ही मिला , मुझे स्मरण है कि, मुझे देकते ही उन्होंने मेरे आने का कारण पूछा , व यह जानकर कि मुझे पदांकन आदेश नही मिल पाया है , वे अपने साथ अपनी कार में ही मुझे कार्यालय ले गये , व संबंधित लिपिक को उसकी ढ़ीली कार्य शैली हेतु डांट लगाई , व मुझे तुरंत मेरा आदेश दिलवाया .मेरा व उन अधिकारि का केवल इतना संबंध था कि उन्होंने पिछले दो तीन वर्षो में ,मेरी कार्य कुशलता , क्षमता व व्यवहार देखा था और अपनी रिपोर्ट में मेरे लिये प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी थीं . मैं समझता हूं कि शायद आज के परिवेश में कोई अधिकारी यदि इस तरह आगे बढ़कर किसी अधीनस्थ कर्मचारी की मदद करे तो शायद उसकी निष्ठा व ईमानदारी पर ही लोग खुसुर पुसुर करने लगें . युग व्यवहार में यह परिवर्तन कब और किस तरह आ गया है समझ से परे है .
हमारी पीढ़ी ने लालटेन और ढ़िबरियो के उजाले को चमचमाती बिजली के प्रकाश में बदलते देखा है . पोस्टकार्ड और तार के इंतजार भरे संदेशों को मोबाइल के त्वरित संपर्को में बदलते हम जी रहे हैं . लम्बी इंतजार भरी थका देने वाली यात्राओ की जगह आरामदेह हवाई यात्राओ से दूरियां सिमट सी गई हैं , हम इसके भी गवाह हैं . मुझे याद है कि १९५० के ही दशक में जब राज्यपाल हमारे मण्डला आने वाले थे तो उनका छपा हुआ टूर प्रोग्राम महीने भर पहले हमारे पास आया था , शायद उसकी एक प्रिंटेड प्रति अब भी मेरे पास सुरक्षित है , अब तो शायद स्वयं राज्यपाल महोदय भी न जानते होंगे कि दो दिन बाद उन्हें कहां जाना पड़ सकता है . भौतिक सुख संसाधनो का विस्तार जितना हमारी पीढ़ी ने अनुभव किया है शायद ही हमसे पहले की किसी पीढ़ी ने किया हो . लड़कियों की शिक्षा के विस्तार से स्त्रियो के जीवन में जो सकारात्मक क्राति आई है वह स्वागतेय है , पर उनके पहनावे में जैसे पाश्चात्य परिवर्तन हम देख रहे हैं , हमसे पहले की पीढ़ी ने कभी नही देखे होंगे . पर इस सबके साथ यह भी उतना ही कटु सत्य है , जिसे मैं स्वीकार करना चाहता हूं और उस पर गहन क्षोभ व अफसोस व्यक्त करना चाहता हूं कि लोक व्यवहार में जितना सामाजिक नैतिक अधोपतन हमारी पीढ़ी ने देखा है , उतनी तेजी से यह गिरावट इससे पहले शायद ही कभी हुई हो .
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव " विदग्ध ", सेवानिवृत प्राध्यापक , प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय , जबलपुर
वरिष्ट कवि , अर्थशास्त्री , व कालिदास के ग्रंथो के हिन्दी पद्यानुवादक
संपर्क ओ बी ११ . विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर , मो ९४२५८०६२५२
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

`धर्म है मन-मिलन, धर्म के नाम पर कहीं कोई विखण्डन नहीं चाहिये´´
प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध
धर्म तो प्रेम का एक पर्याय है, प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये।
पूजा वो है जो मन से हो जिसके लिये, आरती-धूप-चंदन नहीं चाहिये ।।
सब कंंगूरे, कलश और मीनार हैं
भावना के सृजन औं लगन के लिये
शंख घण्टों की ध्वनियॉं, अजानें-सभी हैं
सही ध्यान केन्द्रीकरण के लिये।
जो समझते है, वे सब हैं कहते यही
धर्म का धर्म से भेद कुछ भी नहीं
भावनाओं को बहका के झकझोरने
प्रलयकारी प्रंभजन नहीं चाहिये ।।1।।
एक भगवान है सारे संसार का,
लोगों ने रख लिये उसके कई नाम है।
कहीं मिन्दर हैं, मिस्जद है गुरूद्वारे हैं
कहीं गिरजा-उसी के ये सब धाम है।
व्यक्तिगत धारणा और विश्वास की,
सभी को संवैधानिक खुली छूट हैं
तो किसी के भी धार्मिक अनुष्ठान का कोई
खण्डन या मण्डन नहीं चाहिये ।।2।।
तर्क से फर्क बढ़ता रहा है सदा,
धर्म तो सिर्फ श्रद्धा है विश्वास है
मन से जो साफ जितना है व्यवहार में
इष्ट के अपने वह उतना ही पास है।
भक्ति को भूमि सीमा भवन स्थल की,
या कि सामान की कुछ जरूरत नहीं
उपरी साज सज्जा दिखावा है सब,
धर्म को कोई ठनगन नहीं चाहिये ।।3।।
भेद का हो समापन, सृजन हो नये
एक ऐसे सदन का जहॉं सब मिलें
जिसके विस्तीर्ण गुम्बद के नीचे सभी
धर्म औं पंथ के फूल हिलमिल खिलें।
धर्म को स्वच्छ ममता का घर चाहिये,
ईट- पत्थर से निर्मित नहीं कोई भवन,
भाव-सुमनों को छाया/औं जल चाहिये,
लू के झौंको की झुलसन नहीं चाहिये ।।5।।
है कपट, धर्म का राजनीतीकरण,
नीति के बिन न सार्थक कोई आचरण
धर्म है लोकहित का खुला रास्ता,
रास्ते को कहॉं चाहिये आवरण र्षोर्षो
भूल-भटकाव में राह मिलती नहीं,
साफ दिल हो तो बात इन्साफ की
धर्म है मन-मिलन, धर्म के नाम पर,
कहीं कोई विखण्डन नहीं चाहिये ।।6।।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव `विदग्ध´
(प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´)
रविवार, 16 अगस्त 2009
गायत्री मंत्र का भावानुवाद

गायत्री मंत्र का भावानुवाद
मूल संस्कृत मंत्र
ॐ भूर्भुव स्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
हिन्दी छंद बद्ध भावानुवाद
द्वारा ..प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध"
जो जगत को प्रभा ओ" ऐश्वर्य देता है दान
जो है आलोकित परम औ" ज्ञान से भासमान ॥
शुद्ध है विज्ञानमय है ,सबका उत्प्रेरक है जो
सब सुखो का प्रदाता , अज्ञान उन्मूलक है जो ॥
उसकी पावन भक्ति को हम , हृदय में धारण करें
प्रेम से उसके गुणो का ,रात दिन गायन करें ॥
उसका ही लें हम सहारा , उससे ये विनती करें
प्रेरणा सत्कर्म करने की ,सदा वे दें हमें ॥
बुद्धि होवे तीव्र ,मन की मूढ़ता सब दूर हो
ज्ञान के आलोक से जीवन सदा भरपूर हो ॥
शब्दार्थ ...
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।
संपर्क ... ob 11 MPSEB Colony ,Rampur ,Jabalpur मोब. ०९४२५४८४४५२
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