बेटी का संसार
बड़ा भावमय त्यागमय बिटिया का संसार
प्रेम पगा है मन मगर, नैन अश्रु की धार
बिटिया लक्ष्मी लाडली है घर का सिंगार
जिसका जीवन सजाता है दो-दो परिवार
होना चाहिये घरो में बेटी का सम्मान
बिटिया बिन संभव कहां धार्मिक विविध विधान
गुणी बेटियां बढ़ाती हैं दो घर की शान
दे देती परिवार को एक नई पहचान
अच्छा घर-वर देखकर कर बेटी का ब्याह
खश होते माता-पिता जैसे शाहंशाह
घर जिस पर था जनम से बेटी का अधिकार
हो जाता भावंर पडे सात समदंर पार
नये देश में लोग नये घर बिल्कुल अंजान
सबसे पाती नई बहू उचित मान-सम्मान
घुलमिल सबसे और कर आदर मय व्यवहार
पाती बहुएं चार दिन में घर पर अधिकार
रीति यहीं संसार की रहकर सबके साथ
भुला न पाती बेटियां पर मयके की याद
दोनों घर परिवार की मर्यादा को मान
करती सब व्यवहार रख लोक लाज का ध्यान
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
प्रकाशित किताबें ...ईशाराधन ,वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान,जनसेवा, अंधा और लंगड़ा ,मुक्तक संग्रह,मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद ,रघुवंशम् पद्यानुवाद,समाजोपयोगी उत्पादक कार्य ,शिक्षण में नवाचार
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
लोगो के मन को शहरों को तथा ग्राम्य परिवेश को,
साफ प्रभाव दिखाई देता, गांव, खेत, खलिहान पर
झटक दिया लोगो ने सात्विक सामाजिक आवेश को
सिर्फ बाहरी रूप न बदला मन में भी बदलाव है
आत्मयिता घटी, रिश्तो में अब न रहा लगाव है
कमी आ गई परिवारों में , आपस के संवाद में
सुनती नहीं नई पीढ़ी अब, वृद्धो के आदेश को।
बढ़ तो रहा देश तकनीकी शिक्षा के अवदान से
पर संस्कारहीन से शिक्षित है झूठे अभिमान से
हवा पश्चिमी उड़ा ले गई मधुर भारतीय भावना
डिग्री ले नवयुवक भागते सर्विस को परदेश को
बूढ़े मात पिता है घर में पर उनकी परवाह नहीं
सिर्फ कमाने धन विदेश जाने की मन में चाह रही
समस्यायें कई बढ़ती जाती नई नई परिवारों में
ध्यान नहीं सुनने रामायाण गीता के संदेश को
ग्रामीणों से दूर हो गये जंगल नदी पहाड़ है
पेड़ कटे सब चित्रकूट दण्डक वन हुये उजाड है
विवश ग्राम्य जन दुखी छोड घर, निकल चले है गांव से
क्योंकि उन्हें हल करना रोटी के बढ़ रहे कलेश को
नये परिवर्तन की आंधी से घर सब चकनाचूर है
राम राज्य के सपने सबसे अब भी कोसों दूर है
मन में धार्मिक मान्यताओं का घटा बहुत सम्मान है
दया, दान , सेवा के बदले लालच बढ़ा विशेष है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
लोगो के मन को शहरों को तथा ग्राम्य परिवेश को,
साफ प्रभाव दिखाई देता, गांव, खेत, खलिहान पर
झटक दिया लोगो ने सात्विक सामाजिक आवेश को
सिर्फ बाहरी रूप न बदला मन में भी बदलाव है
आत्मयिता घटी, रिश्तो में अब न रहा लगाव है
कमी आ गई परिवारों में , आपस के संवाद में
सुनती नहीं नई पीढ़ी अब, वृद्धो के आदेश को।
बढ़ तो रहा देश तकनीकी शिक्षा के अवदान से
पर संस्कारहीन से शिक्षित है झूठे अभिमान से
हवा पश्चिमी उड़ा ले गई मधुर भारतीय भावना
डिग्री ले नवयुवक भागते सर्विस को परदेश को
बूढ़े मात पिता है घर में पर उनकी परवाह नहीं
सिर्फ कमाने धन विदेश जाने की मन में चाह रही
समस्यायें कई बढ़ती जाती नई नई परिवारों में
ध्यान नहीं सुनने रामायाण गीता के संदेश को
ग्रामीणों से दूर हो गये जंगल नदी पहाड़ है
पेड़ कटे सब चित्रकूट दण्डक वन हुये उजाड है
विवश ग्राम्य जन दुखी छोड घर, निकल चले है गांव से
क्योंकि उन्हें हल करना रोटी के बढ़ रहे कलेश को
नये परिवर्तन की आंधी से घर सब चकनाचूर है
राम राज्य के सपने सबसे अब भी कोसों दूर है
मन में धार्मिक मान्यताओं का घटा बहुत सम्मान है
दया, दान , सेवा के बदले लालच बढ़ा विशेष है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
नारी से ही सजे हैं , सब आंगन घर द्वार
नारी से ही सजे हैं , सब आंगन घर द्वार
नारी के बिन कहीं भी, सरस नहीं संसार
नारी सुख संतोषप्रद पावन उसका प्यार
जिसकी आंचल छांव में पलता हर परिवार
जीवन रथ के नारी नर है दो चक्र समान
बिना एक के दूसरे का न कहीं सम्मान
लता वृक्ष ज्यों शोभते बांट परस्पर प्यार
हर घर होना चाहिये ऐसा ही व्यवहार
जीवन जीने का सही प्रेम बड़ा आधार
जहां प्रेम है सुलभ भी वहीं सभी अधिकार
देता सुख संतोष सब आपस का विश्वास
भरती चंपा गंध सी मन में मधुर मिठास
घर की शोभा नारि से नर की शोभा नारि
नर-नारी के मेल से प्रमुदित हर परिवार
नारि उपस्थिति बांटता घर में नया उजास
जो न खनकती चूड़िया सूनेपन का भास
नारि कमल के फूल सम लक्ष्मी का अवतार
जिसका घर के लोग संग है मोहक अधिकार
पितुगृह पतिगृह नारि के नदिया के दो पाट
बचपन सजता इस तरफ घर बसता उस पार
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252A
नारी के बिन कहीं भी, सरस नहीं संसार
नारी सुख संतोषप्रद पावन उसका प्यार
जिसकी आंचल छांव में पलता हर परिवार
जीवन रथ के नारी नर है दो चक्र समान
बिना एक के दूसरे का न कहीं सम्मान
लता वृक्ष ज्यों शोभते बांट परस्पर प्यार
हर घर होना चाहिये ऐसा ही व्यवहार
जीवन जीने का सही प्रेम बड़ा आधार
जहां प्रेम है सुलभ भी वहीं सभी अधिकार
देता सुख संतोष सब आपस का विश्वास
भरती चंपा गंध सी मन में मधुर मिठास
घर की शोभा नारि से नर की शोभा नारि
नर-नारी के मेल से प्रमुदित हर परिवार
नारि उपस्थिति बांटता घर में नया उजास
जो न खनकती चूड़िया सूनेपन का भास
नारि कमल के फूल सम लक्ष्मी का अवतार
जिसका घर के लोग संग है मोहक अधिकार
पितुगृह पतिगृह नारि के नदिया के दो पाट
बचपन सजता इस तरफ घर बसता उस पार
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252A
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
लोगो के मन को शहरों को तथा ग्राम्य परिवेश को,
साफ प्रभाव दिखाई देता, गांव, खेत, खलिहान पर
झटक दिया लोगो ने सात्विक सामाजिक आवेश को
सिर्फ बाहरी रूप न बदला मन में भी बदलाव है
आत्मयिता घटी, रिश्तो में अब न रहा लगाव है
कमी आ गई परिवारों में , आपस के संवाद में
सुनती नहीं नई पीढ़ी अब, वृद्धो के आदेश को।
बढ़ तो रहा देश तकनीकी शिक्षा के अवदान से
पर संस्कारहीन से शिक्षित है झूठे अभिमान से
हवा पश्चिमी उड़ा ले गई मधुर भारतीय भावना
डिग्री ले नवयुवक भागते सर्विस को परदेश को
बूढ़े मात पिता है घर में पर उनकी परवाह नहीं
सिर्फ कमाने धन विदेश जाने की मन में चाह रही
समस्यायें कई बढ़ती जाती नई नई परिवारों में
ध्यान नहीं सुनने रामायाण गीता के संदेश को
ग्रामीणों से दूर हो गये जंगल नदी पहाड़ है
पेड़ कटे सब चित्रकूट दण्डक वन हुये उजाड है
विवश ग्राम्य जन दुखी छोड घर, निकल चले है गांव से
क्योंकि उन्हें हल करना रोटी के बढ़ रहे कलेश को
नये परिवर्तन की आंधी से घर सब चकनाचूर है
राम राज्य के सपने सबसे अब भी कोसों दूर है
मन में धार्मिक मान्यताओं का घटा बहुत सम्मान है
दया, दान , सेवा के बदले लालच बढ़ा विशेष है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी रामपुर, जबलपुर
मो. 9425806252
बदल दिया है नव विकास ने मेरे भारत देश को
लोगो के मन को शहरों को तथा ग्राम्य परिवेश को,
साफ प्रभाव दिखाई देता, गांव, खेत, खलिहान पर
झटक दिया लोगो ने सात्विक सामाजिक आवेश को
सिर्फ बाहरी रूप न बदला मन में भी बदलाव है
आत्मयिता घटी, रिश्तो में अब न रहा लगाव है
कमी आ गई परिवारों में , आपस के संवाद में
सुनती नहीं नई पीढ़ी अब, वृद्धो के आदेश को।
बढ़ तो रहा देश तकनीकी शिक्षा के अवदान से
पर संस्कारहीन से शिक्षित है झूठे अभिमान से
हवा पश्चिमी उड़ा ले गई मधुर भारतीय भावना
डिग्री ले नवयुवक भागते सर्विस को परदेश को
बूढ़े मात पिता है घर में पर उनकी परवाह नहीं
सिर्फ कमाने धन विदेश जाने की मन में चाह रही
समस्यायें कई बढ़ती जाती नई नई परिवारों में
ध्यान नहीं सुनने रामायाण गीता के संदेश को
ग्रामीणों से दूर हो गये जंगल नदी पहाड़ है
पेड़ कटे सब चित्रकूट दण्डक वन हुये उजाड है
विवश ग्राम्य जन दुखी छोड घर, निकल चले है गांव से
क्योंकि उन्हें हल करना रोटी के बढ़ रहे कलेश को
नये परिवर्तन की आंधी से घर सब चकनाचूर है
राम राज्य के सपने सबसे अब भी कोसों दूर है
मन में धार्मिक मान्यताओं का घटा बहुत सम्मान है
दया, दान , सेवा के बदले लालच बढ़ा विशेष है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
उन्हें भगवान मिलते है।
उन्हें भगवान मिलते है।
सरोवर के विमल जल में कमल के फूल खिलते है।
जो मन को शुद्ध कर लेते उन्हें भगवान मिलते है।
बड़ा मैला है मन ये खोया रहता नाच गानो में,
उमंगो की तरंगो में या कोई झूठे बहानों में।
जो चिंतन में उतरते है, उन्हें भगवान मिलते है।
रिझाती रहती है मन को सदा ही नई तृष्णायें,
जकड लेती हैं लालच में फंसने को ये बाधाये।
सम्भल के जो निकल पाते उन्हें भगवान मिलते है।
जरूरी है न मन भटके जगत में वासनाओं से,
सिखाना पडता है उसको , बचना कामनाओ से।
जो सात्विकता में जीते हैं, उन्हें भगवान मिलते है।
प्रमुखता होती है मन को सजाने में विचारो की,
विमलता देती है जीवन ,को शुचिता संस्कारो की,
जो होते हैं सरल निश्छल उन्हें भगवान मिलते है।
जरूरी है सफलता के लिये नित साधना भारी,
सरलता और सात्विकता मे होती जिसकी तैयारी।
जो करते है तपस्यायें , उन्हें भगवान मिलते है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
सरोवर के विमल जल में कमल के फूल खिलते है।
जो मन को शुद्ध कर लेते उन्हें भगवान मिलते है।
बड़ा मैला है मन ये खोया रहता नाच गानो में,
उमंगो की तरंगो में या कोई झूठे बहानों में।
जो चिंतन में उतरते है, उन्हें भगवान मिलते है।
रिझाती रहती है मन को सदा ही नई तृष्णायें,
जकड लेती हैं लालच में फंसने को ये बाधाये।
सम्भल के जो निकल पाते उन्हें भगवान मिलते है।
जरूरी है न मन भटके जगत में वासनाओं से,
सिखाना पडता है उसको , बचना कामनाओ से।
जो सात्विकता में जीते हैं, उन्हें भगवान मिलते है।
प्रमुखता होती है मन को सजाने में विचारो की,
विमलता देती है जीवन ,को शुचिता संस्कारो की,
जो होते हैं सरल निश्छल उन्हें भगवान मिलते है।
जरूरी है सफलता के लिये नित साधना भारी,
सरलता और सात्विकता मे होती जिसकी तैयारी।
जो करते है तपस्यायें , उन्हें भगवान मिलते है।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध‘
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
मन की सुनो प्रार्थना
मन की सुनो प्रार्थना
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र
मो ९४२५४८४४५२
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
आये हैं लिये आश बड़ी द्वार तुम्हारे
सागर में है तूफान है मझधार में नैया
कोई न सिवा नाथ , तुम्हारे है खिवैया
जो देख रहे उनकी बड़ी भीड़ लगी है
पर हमसे ही मजबूर , खड़े वे भी किनारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
भँवरों में फंसी डोल, डगमगा रही नैया
जग नाच रहा , तुम्हीं हो इस जग के नचैया
दुनियां में कही कोई भी दिखता नहीं अपना
हम भाग्य के मारों के तुम्हीं नाथ सहारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
हर दीन दुखी की प्रभु ! तुम लाज बचैया
रक्षक सकल संसार के तुम कृष्ण कन्हैया
सुख के सभी साथी हैं , पै दुख में नहीं कोई
संकट की घड़ी में गये तुमसे उबारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र
मो ९४२५४८४४५२
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
आये हैं लिये आश बड़ी द्वार तुम्हारे
सागर में है तूफान है मझधार में नैया
कोई न सिवा नाथ , तुम्हारे है खिवैया
जो देख रहे उनकी बड़ी भीड़ लगी है
पर हमसे ही मजबूर , खड़े वे भी किनारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
भँवरों में फंसी डोल, डगमगा रही नैया
जग नाच रहा , तुम्हीं हो इस जग के नचैया
दुनियां में कही कोई भी दिखता नहीं अपना
हम भाग्य के मारों के तुम्हीं नाथ सहारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
हर दीन दुखी की प्रभु ! तुम लाज बचैया
रक्षक सकल संसार के तुम कृष्ण कन्हैया
सुख के सभी साथी हैं , पै दुख में नहीं कोई
संकट की घड़ी में गये तुमसे उबारे
इस मन की सुनो प्रार्थना भगवान हमारे
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
शारदी चाँदनी सा विमल मन ,जब पपीहा सा तुमको पुकारे
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र
मो ९४२५४८४४५२
शारदी चाँदनी सा विमल मन ,जब पपीहा सा तुमको पुकारे
सावनी घन घटा से उमगते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
प्राण के स्वर स्वतः झनझना के , याद की वीथिका खोल देंगे
मन बसे भावना से रंगे चित्र , आप सब कुछ स्वयं बोल देंगे
याद करते हुये बावरे से , प्रेम रंग में रंगे सांवरे से
भ्रमर से मधुर धुन गुनगुनाते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपने सजन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना
दिन कटे काम की व्यस्तता में , रात गिनते गगन के सितारे ,
सांस के पालने में झुलाये , आश डोरी पै सपने तुम्हारे
मलय ले मधुर शीतल पवन से , बिन रुके कहीं , बढ़ते जतन से
नेह की गंध अपनी लुटाते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपने वचन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना
रात सूने क्षणो में हमेशा , नींद हर , जाल यों डाल जाती
नैन मूंदे हृदय की विकलता , उलझ जिसमें विवश छटपटाती
अनापेक्षित मधुर से संदेशे , मिटाने सभी कल्पित अंदेशे
गीत की लय धुन पर थिरकते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपनी लगन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना ा
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11 एम.पी.ई.बी. कालोनी, रामपुर, जबलपुर म.प्र
मो ९४२५४८४४५२
शारदी चाँदनी सा विमल मन ,जब पपीहा सा तुमको पुकारे
सावनी घन घटा से उमगते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
प्राण के स्वर स्वतः झनझना के , याद की वीथिका खोल देंगे
मन बसे भावना से रंगे चित्र , आप सब कुछ स्वयं बोल देंगे
याद करते हुये बावरे से , प्रेम रंग में रंगे सांवरे से
भ्रमर से मधुर धुन गुनगुनाते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपने सजन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना
दिन कटे काम की व्यस्तता में , रात गिनते गगन के सितारे ,
सांस के पालने में झुलाये , आश डोरी पै सपने तुम्हारे
मलय ले मधुर शीतल पवन से , बिन रुके कहीं , बढ़ते जतन से
नेह की गंध अपनी लुटाते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपने वचन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना
रात सूने क्षणो में हमेशा , नींद हर , जाल यों डाल जाती
नैन मूंदे हृदय की विकलता , उलझ जिसमें विवश छटपटाती
अनापेक्षित मधुर से संदेशे , मिटाने सभी कल्पित अंदेशे
गीत की लय धुन पर थिरकते , स्वप्न से तुम यहाँ चले आना
है कसम तुम्हें अपनी लगन की , राह में प्रिय भटक तुम न जाना ा
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