चार मुक्तक
प्रो.सी.बी.श्रीवास्वत विदग्ध
ओ बी ११ , विद्युत मंडल कालोनी रामपुर जबलपुर
जो कभी कुर्सी पे थे वे अब गुनहगारों में है,
आये दिन खबरें अनोखी उनकी अखबारों में है।
जाने क्यों इंसान का गिर गया है इतना जमीर,
बेच जो इज्जत भी , दौलत के तलबगारों में है।।
हर जगह दुनियां में सारी, बह रही बेढब हवा,
खोजने पर भी कहीं मिलती नही जिसकी दवा।
एक दिन कटता है मुश्किल से कि दे कोई नयी व्यथा,
दूसरा आ धमकता है,दिखाने कोई दबदबा।।
गुम गई इंसानियत यों आजकल इंसान में,
वेबजह आता उतर है हर बशर मैदान में।
आपसी व्यवहार में भी बढ रही मजबूरियां,
दिल जलाती हवा बहती आज हिन्दुस्तान में।।
जानता हर कोई यहां दो दिनो का वह मेहमान है,
फिर भी जाने क्यों हरेक को गजब का अभिमान है।
बढता जाता दिनों दिन टकराव का यूं सिलसिला,
आदमी खुद अपने से भी हो गया बेइमान है।।
प्रकाशित किताबें ...ईशाराधन ,वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान,जनसेवा, अंधा और लंगड़ा ,मुक्तक संग्रह,मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद ,रघुवंशम् पद्यानुवाद,समाजोपयोगी उत्पादक कार्य ,शिक्षण में नवाचार
शनिवार, 9 जुलाई 2011
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं !
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं !
प्रो.सी.बी.श्रीवास्वत विदग्ध
ओ बी ११ , विद्युत मंडल कालोनी रामपुर जबलपुर
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं,
दुनियां में तूफान औ कठिनाइयां है हर कहीं।
पर जहां कठिनाईयां हैं ,वहीं पर हल भी तो है,
दिल में चहिये जूझने की तड़प् ओै बस हौसला।।1।।
जोडने को सागरों को ,नहरें तक गई हैं बनाई,
चीर छाती पर्वतेां की , सुरंगे भी गई कटाई।
यह किया सब आदमी ने ही, निरंतर लगन से,
करना होता काम करने का ,सुनिश्चित फैसला।।2।।
पुल बनाये,सागरों पर,बीहडों में रास्ते,
आदमी ने किये बिरले काम,झेले हादसे।
जीत होती है परिश्रम की हमेशा एक दिन,
जारी रखना होता है श्रम का ,निरंतर सिलसिला।।3।।
सागरों के तल टटोले, नापी नभ उचांइयां,
पहाडों को तोड़ पाने हीरे खोदी खाइयां।
कैसे कैसे करिश्में ,श्रम से किये इंसान ने,
कोशिशें की रोकने की ,सुनामी का जलजला।।4।।
अपने श्रम औ समझ से नये नये ग्रहों तक भेजे यान,
समझ साहस हौसले से ही, है मानव प्राणवान।
हर असंभव को , किया संभव ,मनुज ने अपनी दम,
दिल में चाहिये तडप करने की ,औ बढचढ हौसला।।5।।
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं,
दिल में चहिये जूझने की तड़प् ओै बस हौसला
प्रो.सी.बी.श्रीवास्वत विदग्ध
ओ बी ११ , विद्युत मंडल कालोनी रामपुर जबलपुर
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं,
दुनियां में तूफान औ कठिनाइयां है हर कहीं।
पर जहां कठिनाईयां हैं ,वहीं पर हल भी तो है,
दिल में चहिये जूझने की तड़प् ओै बस हौसला।।1।।
जोडने को सागरों को ,नहरें तक गई हैं बनाई,
चीर छाती पर्वतेां की , सुरंगे भी गई कटाई।
यह किया सब आदमी ने ही, निरंतर लगन से,
करना होता काम करने का ,सुनिश्चित फैसला।।2।।
पुल बनाये,सागरों पर,बीहडों में रास्ते,
आदमी ने किये बिरले काम,झेले हादसे।
जीत होती है परिश्रम की हमेशा एक दिन,
जारी रखना होता है श्रम का ,निरंतर सिलसिला।।3।।
सागरों के तल टटोले, नापी नभ उचांइयां,
पहाडों को तोड़ पाने हीरे खोदी खाइयां।
कैसे कैसे करिश्में ,श्रम से किये इंसान ने,
कोशिशें की रोकने की ,सुनामी का जलजला।।4।।
अपने श्रम औ समझ से नये नये ग्रहों तक भेजे यान,
समझ साहस हौसले से ही, है मानव प्राणवान।
हर असंभव को , किया संभव ,मनुज ने अपनी दम,
दिल में चाहिये तडप करने की ,औ बढचढ हौसला।।5।।
कौन सी है राह,जिस पर कांच औ कांटे नहीं,
दिल में चहिये जूझने की तड़प् ओै बस हौसला
मंगलवार, 17 मई 2011
दुनिया की देख चालें मुझको अजब सा लगता
गजल
प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव "विदग्ध "
संपर्क ओबी ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८
मोबा. ०९४२५८०६२५२, फोन ०७६१२६६२०५२
जो भी मिली सफलता मेहनत से मैने पायी
दिन रात खुद से जूझा किस्मत से की लड़ाई
जीवन की राह चलते ऐसे भी मोड़ आये
जहाँ एक तरफ कुआं था औ" उस तरफ थी खाई
कांटों भरी सड़क थी सब ओर था अंधेरा
नजरों में सिर्फ दिखता सुनसान औ" तनहाई
सब सहते बढ़ते जाना आदत सी हो गई अब
किसी से न कोई शिकायत खुद की न कोई बड़ाई
लड़ते मुसीबतों से बढ़ना ही जिंदगी है
चाहे पहाड़ टूटे , चाहे हो बाढ़ आई
आंसू कभी न टपके न ढ़ोल गये बजाये
फिर भी सफर है लम्बा मंजिल अभी न आई
दुनिया की देख चालें मुझको अजब सा लगता
बेबात की बातों में दी जाती जब बधाई
सुख में विदग्ध मिलते सौ साथ चलने वाले
मुश्किल दिनो में लेकिन कब कोन किसका भाई ?
प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव "विदग्ध "
संपर्क ओबी ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८
मोबा. ०९४२५८०६२५२, फोन ०७६१२६६२०५२
जो भी मिली सफलता मेहनत से मैने पायी
दिन रात खुद से जूझा किस्मत से की लड़ाई
जीवन की राह चलते ऐसे भी मोड़ आये
जहाँ एक तरफ कुआं था औ" उस तरफ थी खाई
कांटों भरी सड़क थी सब ओर था अंधेरा
नजरों में सिर्फ दिखता सुनसान औ" तनहाई
सब सहते बढ़ते जाना आदत सी हो गई अब
किसी से न कोई शिकायत खुद की न कोई बड़ाई
लड़ते मुसीबतों से बढ़ना ही जिंदगी है
चाहे पहाड़ टूटे , चाहे हो बाढ़ आई
आंसू कभी न टपके न ढ़ोल गये बजाये
फिर भी सफर है लम्बा मंजिल अभी न आई
दुनिया की देख चालें मुझको अजब सा लगता
बेबात की बातों में दी जाती जब बधाई
सुख में विदग्ध मिलते सौ साथ चलने वाले
मुश्किल दिनो में लेकिन कब कोन किसका भाई ?
बने भवनो को न तोड़ें बुद्धि से सोचें जरा निर्माण सारा व्यैक्तिक से ज्यादा राष्ट्रीय है संपदा
बुद्धि से सोचें जरा
प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
संपर्क ओबी ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८
मोबा. ०९४२५८०६२५२, फोन ०७६१२६६२०५२
बने भवनो को न तोड़ें बुद्धि से सोचें जरा
निर्माण सारा व्यैक्तिक से ज्यादा राष्ट्रीय है संपदा
पेड़ हो कोई कहीं भी सबको देता आसरा
क्या उचित उसको मिटाना जो सघन सुखप्रद हरा ?
समझें कितनी मुश्किलों से खड़ी होती झोपड़ी
वर्षो की मेहनत से हो पाता कोई सपना हरा
काटकर के पेट कोई कुछ जुटा पाता है धन
ऐसे हर पैसे में होता मन का प्यारा रंग भरा
तोड़ घर परिसर निरर्थक वैद्यता कि नाम पर
व्यक्ति औ" सरकार दोनो का ही है अनहित बड़ा
नष्ट कर संपत्ति को शासन तो कुछ पाता नहीं
पर दुखी परिवार हो जाता सदा को अधमरा
ढ़हाना निर्मित भवन का कत्ल जैसा पाप है
उचित कह सकता इसे है सिर्फ कोई सिरफिरा
तोड़ना धन श्रम समय का राष्ट्रीय नुकसान है
जिससे व्यक्ति समाज रहता सदा डरा डरा
जोश में आदेश तो हो जाते शासन के मगर
जख्म पीड़ित जनो का जीवन भर न जाता भरा
नया हर निर्माण नियमित राष्ट्र का उत्कर्ष है
ध्वस्त करके सृजन का अपमान करना है बुरा
दण्ड दें उन व्यक्तियो को जो हैं मर्यादित नही
तोड़ना निर्मित घरो को है नही निर्णय सही
तोड़कर निर्माण दी जाती सजा निर्दोष को
जीने का अधिकार उनका जाता क्यो नाहक हरा
बिल्डरो की गलतियो का अर्थदण्ड उनको ही दें
लिप्त यदि अधिकारी हों तो उनसे जाया धन भरा
नागरिक को खाने रहने जीने का मौलिक अधिकार है
उन्हें दुख देना नहीं है न्याय स्वस्थ परंपरा
बने भवनो को न तोड़ें शांति से सोचें जरा
अनैतिकता तो बुरी है पर नही कोई घर बुरा
बुरा है अपराध पर अपराधी को तक देते क्षमा
उचित है अपराध पकड़ो मत करो घर से घृणा
प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"
संपर्क ओबी ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र. ४८२००८
मोबा. ०९४२५८०६२५२, फोन ०७६१२६६२०५२
बने भवनो को न तोड़ें बुद्धि से सोचें जरा
निर्माण सारा व्यैक्तिक से ज्यादा राष्ट्रीय है संपदा
पेड़ हो कोई कहीं भी सबको देता आसरा
क्या उचित उसको मिटाना जो सघन सुखप्रद हरा ?
समझें कितनी मुश्किलों से खड़ी होती झोपड़ी
वर्षो की मेहनत से हो पाता कोई सपना हरा
काटकर के पेट कोई कुछ जुटा पाता है धन
ऐसे हर पैसे में होता मन का प्यारा रंग भरा
तोड़ घर परिसर निरर्थक वैद्यता कि नाम पर
व्यक्ति औ" सरकार दोनो का ही है अनहित बड़ा
नष्ट कर संपत्ति को शासन तो कुछ पाता नहीं
पर दुखी परिवार हो जाता सदा को अधमरा
ढ़हाना निर्मित भवन का कत्ल जैसा पाप है
उचित कह सकता इसे है सिर्फ कोई सिरफिरा
तोड़ना धन श्रम समय का राष्ट्रीय नुकसान है
जिससे व्यक्ति समाज रहता सदा डरा डरा
जोश में आदेश तो हो जाते शासन के मगर
जख्म पीड़ित जनो का जीवन भर न जाता भरा
नया हर निर्माण नियमित राष्ट्र का उत्कर्ष है
ध्वस्त करके सृजन का अपमान करना है बुरा
दण्ड दें उन व्यक्तियो को जो हैं मर्यादित नही
तोड़ना निर्मित घरो को है नही निर्णय सही
तोड़कर निर्माण दी जाती सजा निर्दोष को
जीने का अधिकार उनका जाता क्यो नाहक हरा
बिल्डरो की गलतियो का अर्थदण्ड उनको ही दें
लिप्त यदि अधिकारी हों तो उनसे जाया धन भरा
नागरिक को खाने रहने जीने का मौलिक अधिकार है
उन्हें दुख देना नहीं है न्याय स्वस्थ परंपरा
बने भवनो को न तोड़ें शांति से सोचें जरा
अनैतिकता तो बुरी है पर नही कोई घर बुरा
बुरा है अपराध पर अपराधी को तक देते क्षमा
उचित है अपराध पकड़ो मत करो घर से घृणा
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011
मालियों को न परवाह इसकी,.........
वो बगीचा जहाॅ फूल रसगंध थी,
आज वीरान दिखती है सब क्यारियाॅं।
मालियों को न परवाह इसकी,
सभी दिख रहे कर रहे और तैयारियाॅ।
फूल खिलते जहाॅ थे हैं कांटे उगे
थी बहारे जहाॅ, आज पतझार है।
लोग कहते तो है ये बगीचा है पर
दिखता इससे किसी को नहीं प्यार है।
बदली तासीर आबो हवा इस तरह
फूल मुरझाये कांटे बढ़े हर तरफ।
ज्यों दवा की कि फिर पौध विकसे नई
और बढ़ती गई रोज बीमारियाॅं।
इक बवंडर उठा छा धुंधलका गया
धूल से भर गया पूर्ण वातावरण।
आदमी व्यस्त अपनी संजोने में है,
पड़ी फीकी मधुर भावना की किरण।
आचरण धर्म ईमान सब खो गये
हाथ गठरी संभाले हुए दाम की।
इस अंधेरे में खुद गुम गया आदमी
सब समेटे हुए व्यर्थ बेकारियाॅ।
नीति कोपल सिसकती है बंदिनी बनी
हाल बेखबर राज दरबार मे।
दे सहारा उठाये संवारे उसे
आज दिखता नहीं कोई संसार में।
जिंदगी में उमस, सांस में है कसक
सारी जनता परेषान है हाल से।
फिर से मिट्टी अगर बन न पाई नई
कैसें संभलेगी उजडी ये फुलवारियाॅं।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
आज वीरान दिखती है सब क्यारियाॅं।
मालियों को न परवाह इसकी,
सभी दिख रहे कर रहे और तैयारियाॅ।
फूल खिलते जहाॅ थे हैं कांटे उगे
थी बहारे जहाॅ, आज पतझार है।
लोग कहते तो है ये बगीचा है पर
दिखता इससे किसी को नहीं प्यार है।
बदली तासीर आबो हवा इस तरह
फूल मुरझाये कांटे बढ़े हर तरफ।
ज्यों दवा की कि फिर पौध विकसे नई
और बढ़ती गई रोज बीमारियाॅं।
इक बवंडर उठा छा धुंधलका गया
धूल से भर गया पूर्ण वातावरण।
आदमी व्यस्त अपनी संजोने में है,
पड़ी फीकी मधुर भावना की किरण।
आचरण धर्म ईमान सब खो गये
हाथ गठरी संभाले हुए दाम की।
इस अंधेरे में खुद गुम गया आदमी
सब समेटे हुए व्यर्थ बेकारियाॅ।
नीति कोपल सिसकती है बंदिनी बनी
हाल बेखबर राज दरबार मे।
दे सहारा उठाये संवारे उसे
आज दिखता नहीं कोई संसार में।
जिंदगी में उमस, सांस में है कसक
सारी जनता परेषान है हाल से।
फिर से मिट्टी अगर बन न पाई नई
कैसें संभलेगी उजडी ये फुलवारियाॅं।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर
संतुलन चाहिए
संतुलन चाहिए
जग में अपनी औ‘ सबकी खुषी के लिये,
स्वार्थ परमार्थ में संतुलन चाहिए।
खोज पाने सही हल किसी प्रष्न का,
परिस्थिति का सही आंकलन चाहिये।
आये बढ़ते निरंतर मनुज के चरण
किंतु अपने से आगे न उठ पाया मन।
सारी दुनिया इसी से परेषान है
कई के आॅसुओ से भरे है नयन।
सारी दुनिया में दुख के शमन के लिए
पूर्व-पष्चिम के मन का मिलन चाहिए।
आज आॅगन धरा का बना है गगन
नई आषाओं से दिखते चेहरे मगन।
भूल छोटी सी ही पर किसी भी तरफ
डर है कर सकती जग की खुषी का हरण।
एक आॅगन में सम्मिलित जषन के लिये
भावनाओं का एकीकरण चाहिए।
मन की बातो का मुॅह ने किया कम कथन
ये है इस सभ्य दुनियाॅ का प्रचलित चलन।
हाथ तो सबने मिलकर मिलाये मगर
यह बताना कठिन कितने मिल पाये मन।
विश्व में मुक्त वातावरण के लिए
पारदर्षी खुला आचरण चाहिए।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
जग में अपनी औ‘ सबकी खुषी के लिये,
स्वार्थ परमार्थ में संतुलन चाहिए।
खोज पाने सही हल किसी प्रष्न का,
परिस्थिति का सही आंकलन चाहिये।
आये बढ़ते निरंतर मनुज के चरण
किंतु अपने से आगे न उठ पाया मन।
सारी दुनिया इसी से परेषान है
कई के आॅसुओ से भरे है नयन।
सारी दुनिया में दुख के शमन के लिए
पूर्व-पष्चिम के मन का मिलन चाहिए।
आज आॅगन धरा का बना है गगन
नई आषाओं से दिखते चेहरे मगन।
भूल छोटी सी ही पर किसी भी तरफ
डर है कर सकती जग की खुषी का हरण।
एक आॅगन में सम्मिलित जषन के लिये
भावनाओं का एकीकरण चाहिए।
मन की बातो का मुॅह ने किया कम कथन
ये है इस सभ्य दुनियाॅ का प्रचलित चलन।
हाथ तो सबने मिलकर मिलाये मगर
यह बताना कठिन कितने मिल पाये मन।
विश्व में मुक्त वातावरण के लिए
पारदर्षी खुला आचरण चाहिए।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
शासक वर्ग जहाॅ नैतिक आचरणवान नहीं होगा
शासक वर्ग जहाॅ नैतिक आचरणवान नहीं होगा
जनता से नैतिकता की आषा करना है धोखा।
देष गर्त में दुराचरण के नित गिरता जाता है,
आषा के आगे तम नित गहरा घिरता जाता है।
क्या भविष्य होगा भारत का है सब ओर उदासी,
जन अषांति बन क्रांति न कूदे उष्ण रक्त की प्यासी।
अभी समय है पथ पर आओं भूले भटके राही,
स्वार्थ सिद्धि हित नहीं देष हित बनो सबल सहभागी।
नहीं चाहिए रक्त धरा को, तुम दो इसे पसीना,
सुलभ हो सके हर जन को खुद और देष हित जीना।
मानव की सभ्यता बढ़ी है नहीं स्वार्थ के बल पर,
आदि काल से इस अणुयुग तक श्रमरथ पर ही चलकर।
स्वार्थ त्याग कर जो श्रम करते वें ही कुछ पाते है,
भूमिगर्भ से हीरे, सागर से मोती लाते है।
त्याग राष्ट्र का स्वास्थ्य शक्ति है, स्वार्थ बड़ी बीमारी,
सदा स्वार्थ से ही उठती है भारी अड़चन सारी।
अगर देष को अपने है उन्नत समर्थ बनाना,
स्वार्थ, त्याग, उत्तम, चरित्र सबको होगें अपनाना।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
रामपुर, जबलपुर
मो.9425806252
जनता से नैतिकता की आषा करना है धोखा।
देष गर्त में दुराचरण के नित गिरता जाता है,
आषा के आगे तम नित गहरा घिरता जाता है।
क्या भविष्य होगा भारत का है सब ओर उदासी,
जन अषांति बन क्रांति न कूदे उष्ण रक्त की प्यासी।
अभी समय है पथ पर आओं भूले भटके राही,
स्वार्थ सिद्धि हित नहीं देष हित बनो सबल सहभागी।
नहीं चाहिए रक्त धरा को, तुम दो इसे पसीना,
सुलभ हो सके हर जन को खुद और देष हित जीना।
मानव की सभ्यता बढ़ी है नहीं स्वार्थ के बल पर,
आदि काल से इस अणुयुग तक श्रमरथ पर ही चलकर।
स्वार्थ त्याग कर जो श्रम करते वें ही कुछ पाते है,
भूमिगर्भ से हीरे, सागर से मोती लाते है।
त्याग राष्ट्र का स्वास्थ्य शक्ति है, स्वार्थ बड़ी बीमारी,
सदा स्वार्थ से ही उठती है भारी अड़चन सारी।
अगर देष को अपने है उन्नत समर्थ बनाना,
स्वार्थ, त्याग, उत्तम, चरित्र सबको होगें अपनाना।
प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
रामपुर, जबलपुर
मो.9425806252
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